The Poem “Qudrat”  By Nalini Gupta Guest Post

I am Nalini Gupta. I live in Singapore with my family. I am a Primary School Teacher here. In my younger days, I have worked as a Radio and TV host. I have done a lot of professional compering in English and Hindi. I did all this in Ahmedabad and New Delhi. Its been 22 + years out of India but we visit India very very often and still hold Indian citizenship. My passions include teaching, writing poems occasionally, walking, growing microgreens, somewhat cooking, and taking care of the family. I wish the post COVID world becomes one sustainable/eco-friendly green world which can be proudly handed over to the next generation. My sincere prayers for all those suffering.

The Poem Qudrat in Hindi

इंसान की ज़रूरतें कुछ इस कदर हो गयीं हैं कम
जब से कुदरत ने कराया यह एहसास
जो खुशियां तुम बाहर ढूंढते रहे
वोह हमेशां से थीं तुम्हारे पास

कभी फुर्सत से झाँका नहीं अपने गिरेबान में
कभी बेबुनियाद ख्वाहिशों पर लगाई नहीं रोक
दिन रात सिर्फ इक्कठा की दौलत -ए- कागज़
बहुत पीछे छूट गयी दौलत -ए- इंसानियत

इंसान की ज़रूरतें कुछ इस कदर हो गयीं हैं कम
जब से कुदरत ने कराया यह एहसास

कुदरत ने बजाई जब ईंट से ईंट, हिल गयी धरती और फलक
आग लगने पर, कुँए की खुदाई करने चला इंसान
तब तक बेशुमार उम्रों के, पैमाने गए थे छलक

इंसान की ज़रूरतें कुछ इस कदर हो गयीं हैं कम
जब से कुदरत ने कराया यह एहसास..

कुदरत ने रचा एक ऐसा चक्रव्यूह, ऐसी की साज़िश
आज परिंदे उड़ रहे हैं नीले गगन के तले
चार दीवारी मैं है क़ैद इंसान, अपनी छत के तले

इंसान की ज़रूरतें कुछ इस कदर हो गयीं हैं कम
जब से कुदरत ने कराया यह एहसास..

नेमतों को लूटने का हिसाब, चूका रहा है हर एक इंसान
बक्शा नहीं कोई अमीर गरीब, बच्चा बूढ़ा और जवान
निर्मूल ज़रूरतों के कदम, कुछ यूँ है लड़खड़ाए
इंसान के धर्म ईमान, कुछ यूँ है डगमगाए
जिनसे कभी किया था वायदा, सहारा और कंधा
आज घर फूँक तमाशा देख रहा है हर बन्दा
क़ुदरत ने गले में डाला है ऐसा फंदा

इंसान की ज़रूरतें कुछ इस कदर हो गयीं हैं कम
जब से कुदरत ने कराया यह एहसास
जो खुशियां तुम बाहर ढूंढते रहे
वह हमेशां से थीं तुम्हारे पास

Poem Written By Nalini Gupta From Singapore

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