Baby Poem in Hindi By Prabhudayal Srivastav

Hello Kids You cand read Five Baby poem in Hindi and learn, enjoy and happy for reading these lovely poems by Prabhudayal Srivastav.

Summer Poem : गर्मी का गोला

जाने क्या सूझा सूरज को,
जन-गण-मन पर हमला बोला।
मार्च माह जाते-जाते ही,
दाग दिया गर्मी का गोला।

सर्र फर्राती हवा चल पड़ी।
तीर चले अंगारों वाले।
धरती हो गई गर्म तवे सी,
पड़ने लगे पगों में छाले।

मौसम के नीले सागर में
इस निर्मम ने लावा घोला।

खत्म परीक्षा आए नतीजे,
पर शाला से मिली न छुट्टी।
बस्ता कंधे पीठ किताबों,
से कर पाए अभी न कुट्टी।

नहीं किसी शाला ने अब तक,
छुट्टी देने को मुंह खोला।

सूरज शिक्षक सरकारों को,
नहीं दया हम पर आती है।
किरणों के चाबुक से हमको,
भरी दुपहरिया पिटवाती है।
सूरज से अब हम क्या बोलें,
घड़ा धूप का सिर पर ढोला।

बच्चों की मजेदार कविता : आलो बालो

रज्जो ने सज्जो के दोनों,
सज्जो ने रज्जो के दोनों,
पकड़े कान।

कान पकड़ कर लगी खेलने,
आलो बालो, आलो बालो।

आगे पीछे कान हिलाकर,
बोली मन के चना चबा लो।सज्जो बोली कान छोड़ अब,
कानों की ले अब मत जान।

फिर खेलीं, फिर चाल बढ़ाई,
खिचने लगे जोर से कान।दर्द बढ़ा धीरे-धीरे तो,
फिर आई आफत में जान।

दोनों लगीं चीखने बोलीं,
धीरे कान खींच शैतान।

थके कान तो रज्जो बोली,
चलो खेल अब बंद करें।

कान छुड़ाकर सज्जों बोली,
कुछ मस्ती आनंद करें।

फिर दोनों ने उछल कूद कर,
खुशियों से भर दिया मकान।

 

चटपटी बाल कविता : हंसी-हंसी बस, मस्ती-मस्ती

मुन्ना हंसता मुन्नी हंसती,
रोज लगाते खूब ठहाके।
लगता खुशियों के सरवर में,
अभी आए हैं नहा-नहाके।

उनको हंसते देख पिताजी,

माताजी मुस्काने लगते।
हंसी-हंसी बस मस्ती-मस्ती,
गीत, तराने गाने लगते।
सारे घर को चहका देते,
दादाजी कहकहे लगाके।

घर की मस्ती देख देखकर,
सोफे भी इठलाने लगते।
तकिया चादर दरी रजाई,
उठ-उठकर सब गाने लगते।
गुंड कंसहड़ी थाल जताते।
खुशियां, ढम-ढम ढोल बजाके।

पीछे रहती क्यों दीवारें,
छप्पर छत कैसे चुप रहते।
होती घर में उछल कूद तो,
मन ही मन में वे भी हंसते।
दरवाजे भी धूम मचाते।
अपने परदे हिला-हिला के।

दोस्ती पर मजेदार कविता : ‘द’ से दोस्त

न से नफरत
झ से झगड़ा
कभी न पढ़ना भाई।
द से दोस्त
बने रहने में
होती सदा
भलाई।

सर्दी के दिनों पर चटपटी कविता : शीत लहर के पंछी

रुई के पंखे लगा-लगा कर।

चारों तरफ धुंध दिन में भी,
कुछ भी पड़ता नहीं दिखाई।

मजबूरी में बस चालक ने,
बस की मस्तक लाइट जलाई।

फिर भी साफ नहीं दिखता है,
लगे ब्रेक, करते चीं-चीं स्वर।

विद्यालय से जैसे-तैसे,
सी-सी-करते आ घर पाएं।

गरम मुंगौड़े, आलू छोले,
अम्मा ने मुझ को खिलवाएं।

सर्दी मुझे हो गई भारी,
बजने लगी नाक घर-घर-घर।
अदरक वाली तब दादी ने,
मुझको गुड़ की चाय पिलाई।

मोटी-सा पश्मीनी स्वेटर,
लंबी-सी टोपी पहनाई।
ओढ़ तान कर सोए अब तक,
पापा को भी हल्का-सा ज्वर।